कभी तो दरवाज़े खोलो…

कल तक नैनों में आज़ाद एहसास दिखते थे।
कलम में स्याही भी बेबाक बहती थी।
आज नैनों में एहसास धूमिल है,
आजादी की किरण अंधेरों में मद्धिम है।।

दीवाने-ए-आम की बैठक अतिरिक्त, अभिशिप्त रहती है।
दीवाने-ए-ख़ास की देहलीज पर भ्रष्टाचार की कीमत रहती है,
कभी तो ये देहलीज उखाड़ो ?

जो अरमान दिल में था, आज खो गया।
जो इन्कलाब लहू में था, वो भी थम गया।
और वो बेचारी आजादी,
सकुची-सिमटी-घबरायी,
बंद है सलाखों में।।
कभी तो ये सलाखें तोड़ो?

कभी कभी वह रूह,
बंधन तोड़ भागती फिरती है
वीरान गलियारों  में।
किसी परछाई में…अदृश्य स्वाभिमान खोजती है।
बंद खिडकियों के कांच में…टूटे  गुरूर को घूरती है।
वक़्त की खोयी तवारिखे…
जाने किस मकसद को टटोलती है?

आज भी दस्तक देती है…..
कभी तो दरवाज़े खोलो…कभी तो दरवाजे खोलो?

(sumtime around when author was disillusioned

coz’ of CWG fiasco + ayodhya verdict )

Advertisements

2 comments

  1. Ashish

    bahut khoob sarkar …bahut umda…

  2. Anu

    Thanks Bhai . tumhari iss kavita nein mujhe khoob waah-waahi dilaaayi .
    main fir se ek pankti chura raha hun. farzi ki tarref ka maza hi aur hai 😉

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: